ज्ञानदीक्षा पर्व आयोजन : दीक्षा का अर्थ होता है ' किसी साधना में संकल्प पूर्वक लक्ष्य बनाकर प्रविष्ट होना '। छात्र जब स्नातक बनने के संकल्प के साथ महाविद्यालय में प्रवेश लेता है, तभी वह स्नातक साधना के लिए दीक्षित होता है । स्नातक का अर्थ है- 'ज्ञान में नहाए हुए' । आज तो सत्र रैगिंग से आरंभ होते है और वर्ष भर जो शिक्षा चलती है, वह क्रमश़: सिरदर्द बनती चली जाती है । उसमें कहीं भी विद्या का समावेश नही होता । जिस तरह अंत में दीक्षांत समारोह किए जाते हैं, उसी तरह प्रारम्भ में ज्ञान दिक्षा समारोह करना विवेक सम्मत है । देव संस्कृति विश्वविद्यालय ने अपने हर छमाही सत्र में एक दीक्षारंभ समारोह (ज्ञानदीक्षा पर्व) आयोजित करने की परम्परा जुलाई, २००२ से विश्वविद्यालय के जन्म के साथ ही आरंभ की थी। अब तक बारह समारोह हो चुके हैं और तेरहवां ज्ञानदीक्षा पर्व जुलाई, २००८ में आयोजित किया गया । दीक्षारभं में जिन्होने भागीदारी की है, उनने इसके महत्व को समझा है, कृतकृत्य हुए हैं, और इस दृश्य के साक्षी बनने पर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया है । ज्ञानदीक्षा समारोह में छात्र-छात्राओं को दीक्षित किया जाता है । यह गुरु वरण की तरह है । यह दीक्षा विद्या को जीवन में उतारने के लिए दी जाती है । मौलिक गुणों का विकास, गुणवत्ता में वृद्धि तथा क्षमता-अभिवर्द्धन इस आयोजन का लक्ष्य है, इसलिए यह पथंनिरपेक्ष है । इस पर्व में आचार्य और छात्र एक साथ दीक्षित होते हैं । एक संक्षिप्त सा कर्मकांड बनाया गया है, जो हर विद्यालय, महाविद्यालय , तकनीकी संस्थानो में आयोजित किया जा सकता है । देव संस्कृति विश्वविद्यालय की ही तरह अब कई संस्थानों में दीक्षारंभ संस्कार होने लगे हैं । यह एक पावन परंपरा है, जिसका विस्तार होना चाहिए । १५ वाँ ज्ञान दीक्षा समारोह सम्पन्न शान्तिकुन्ज हरिद्वार के सभागार के प्रागण मे देवसँस्कृति विश्वविधालय का १५ वाँ ज्ञानदीक्षा समारोह सम्पन्न हुआ. देश के लगभग १७ राज्यो से आए श्वेत परिधान में बैठे छात्र-छात्राओं को विश्वविधालय के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रेरणा भरे माहौल ज्ञानदीक्षा का अमृतपान कराया. इस अवसर पर पतञ्जलि विश्वविधालय के कुलाधिपति योगऋषि स्वामी रामदेव मुख्य अथिति के रुप मे उपस्थित थे. उन्होने कहा कि ज्ञान की महत्ता सर्वोपरि है. ज्ञान ही अंधेरे के तमस को चीरकर व्यक्ति को जीवन प्रकाश तक पहुँचाता है. देसंविवि तथा पतञ्जलि विश्वविधालय के लक्ष्य व उद्देश्य समान हैं और दोनो एक दुसरे के सहयोग से युवा शक्ति का सशक्त मार्गदर्शन करेंगी. दोनों संस्था के प्रमुखों ने आगामी दशक तक भारतवर्ष को तरुणाई, उत्साह, उल्लास से ओतप्रोत युवाओं का राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया.
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